Raja KrushnaDevray Aur Chatur Tenaliram- Behatarin Hindi Story Bhandar

प्रिय पाठक, स्वागत है आज की नयी अपमान का बदला- बेहतरीन तेनालीराम के किस्सो की हिंदी कहानिया पर.  Tenaliram ने ऐसा सुना था की, राजा कृष्णदेवराय बुद्धिमान, गुणवान लोगो का बहुत आदर करते है. उसने सोचा की राजा कृष्णदेवराय के पास जाकर उनके भाग्य की परीक्षा ली जाये. लेकिन किसी के मदत के बिना राजा के आसपास भी जाना आसान नही था. तेनालीराम ऐसे क्षण की राह देखने लगा की कब ऐसे व्यक्ति से मुलाकात होगी जो राजा से मुलाकात करवा सके. Chatur Tenaliram Ke Kisse Aur Raja KrushnaDevray Ki Hindi Kahani

इसीबीच तेनालीराम की शादी उन्ही के किसी दूर के रिश्तेदार की एक लड़की मगम्मा के साथ हुयी. इन्ही दिनो राजा कृष्णदेवराय के राजगुरु ताताचारी Tenaliram के पास मंगलगीरी नाम के जगह पर आया. वह जाकर तेनालीराम ने उसकी बहुत सेवा की और अपनी समस्या सुनाई.

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राजगुरु बहुत ही चालाख था. उसने Tenaliram से खुप सेवा कराई और बड़े-बड़े वादे करने लगा. तेनालीराम ने भी उसपर भरोसा किया. उसने राजगुरु को प्रसन्न करने के लिए रात-दिन एक कर दिए. राजगुरु भी ऊपर-ऊपर लुभाने की बाते करता रहता. लेकिन मन ही मन तेनालीराम की होशियारी और प्रसिद्धि पर जलन करने लगा. लेकिन जाते वक़्त उसने तेनालीराम को वचन दिया, जब भी तुम्हे ऐसा लगे की, अब अच्छा समय है, मै राजा कृष्णदेवराय से तुम्हारी पहचान करने के लिए बुला लूंगा.

तेनालीराम, राजगुरुके बुलाने की राह देखने लगे. लेकिन बुलावा आने वाला नही था और आया भी नही. आखिर बहुत राह देखने के बाद परेशान उसीने पक्का किया की अब मै खुद विजयनगर जाऊंगा. Tenaliramne अपना घर, घर का पूरा सामान बेचकर जाने का खर्चा एकट्ठा किया और मा, बीबी, बच्चे इनको लेकर विजयनगर जाने के लिए निकल गए.

रास्ते मे जब भी समस्या आती Tenaliram राजगुरु का नाम लेता और कहता मै उनका शिष्य हु. उसने अपनी मा से कहा जहा राजगुरु का नाम लिया बला टल गयी. आदमी कैसा भी हो लेकिन उसका नाम बडा हो तो हर समस्या चुटकी मे निकल जाती है. लगता है मुझे खुद का नाम बदलना होगा. राजा कृष्णदेवराय के सामने सम्मान दिखाने के लिए मुझे मेरे नाम के आगे कृष्ण नाम लगाना ही होगा. इसीलिए आजसे मेरा नाम रामकृष्ण होगा. बेटे मेरे लिए तो दोनों ही नाम अच्छे है. मै तो अब भी तुम्हे राम नामसे ही बुलाती हु. आगे भी इसी नाम से भुलाउंगी.

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आगे चलकर कोडवीत गांव मे Tenaliram के राज्यप्रमुख से हुयी. वह विजयनगर के प्रधानमत्री का संबंधी था. उसने कहा महाराज बहुत ही गुणवान, विद्वान् और उदार है लेकिन जब वह क्रोधित होते है तब देखते ही देखते उनकी आखे शरीर से अलग हो जाती है.

जब तक आदमी संकटो से लड़ता नही तब तक वह सफल होता नही. मै खुद आखे पढ़ सकता हु. तेनालीराम की आखो मे तेज था. राज्यप्रमुख ने यह भी कहा की प्रधानमंत्री भी गुनी व्यक्तियो का आधार करते है. लेकिन ऐसे लोगो के लिए उनके पास कोई जगह नहीं जो खुद की मदत खुद नहीं कर सकता. इसबीच चार महीने के यात्रा के बाद Tenaliram विजयनगर पंहुचा.

वहा की चमक धमक देखकर तेनालीराम दंग रह गया. बड़े बड़े रास्ते, गजराज, अश्व, सजी दुकाने और बडे बड़े महल यह सब उसके लिए बिलकुल नए थे. उसने वहापर रहने के लिए एक परिवार से रहने के लिए छोटीसी जगह की विनती की. उस परिवार के मुखिया ने इसके लिए मंजूरी दे दी. अपनी मा, बीबी, बच्चो को वही छोड़कर Tenaliram राजगुरु की तरफ निकल पढ़ा.

वहा पर लोगो की महफ़िल लगी थी. राजमहल मे बड़े बड़े कर्मचारी से लेकर रसोईघर मे काम करने वाले लोग तक वहा थे. नोकर-चाकरों की कमी नहीं थी. तेनालीराम ने एक सिपाई से कहकर सन्देश भिजवाया की उन्हें कहे Tenaliram आया है. थोड़ी देर बाद सिपाई वापस आया और कहा राजगुरुने कहा है, वह तेनालीराम इस नाम को जानते नही है. तेनालीराम को इस बात का काफी अचम्बा हुवा. वह खुद ही जैसे-तैसे राजगुरु तक पहुंच गए. लेकिन राजगुरु ने Tenaliram को पहचानने तक से इनकार कर दिया और धक्के मारकर वहा से निकाल दिया.

इस अपमान को तेनालीराम भूल नही पा रहा था, अपमान की आग मे जलते हुए उसने कसम खाई की राजा कृष्णदेवराय को प्रसन्न करके राजगुरु से इस अपमान का बदला जरुर लूंगा. दूसरे ही दिन तेनालीराम राजदरबार मे जाकर पंहुचा, उसने देखा की, वहापर जोर-जोर से किसी बात पर बहस हो रही थी. संसार क्या है? जीवन क्या है? इस प्रकार के बड़े-बड़े सवालो पर वह बहस छिड़ी हुयी थी.

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एक पंडित वह पर अपने विचार प्रकट कर रहे थे. “यह संसार एक बहुत बड़ी खाई है, हम जो सुनते है, देखते है, जानते है, खाते है, सुंघते है वह केवल अपनी सोच है. वास्तविक मे यह सब नही होता, लेकिन हम सब सोचते है की यह सत्य होता है.” क्या ये सच मे होता है? Tenaliram ने अचम्बे से पूछा.

“यह सब कथाये अपने शास्त्रोमें भी कहे गए थे. पंडित जी अपने विचार बया कर रहे थे और कहा शास्त्रों मे जो कहा गया है वह वह झूठा कैसे हो सकता है. यह सुनकर वह खड़े सभी लोग शांत हो गए.

तेनालीराम को शास्त्रों से ज्यादा अपनी बुद्धि पर भरोसा था. वह वहा बैठे हुए सभी लोगो से कहने लगा, अगर ऐसा है तो हम पंडितजी के इन विचारो की सच्चाई खोज कर देखेंगे. हमारे उदार राजा की तरफ से आज जो महफ़िल बुलाई गयी है, जो खूबसूरत पकवान बनाये गए है उन्हें पेट भर के खाएंगे. लेकिन पंडितजी ऐसा नही करेंगे हम सब उनसे प्रार्थना करते है की वह बैठे रहे और सोचे की मेजवानी का आनंद उठाते हुए पेटभर खाना खा रहे है.

इस बात को सुनकर सभी महल मे जमे लोगो ने तालिया बजाई और कहा की ऐसा नही होता यह सच्चाई होती है संसार कोई सोचने की वस्तु नही जो सिर्फ सोच मे बसे. महाराज कृष्णदेवराय Tenaliram पर इतने खुश हुए की उन्होंने तेनालीराम को सुवर्णमुद्राओ की एक झोली प्रधान कर दी. इसी के साथ-साथ राज्य का विदूषक भी बना दिया. सभी लोगो ने तालिया बजाई इस बिच वहापर राजगुरु भी था.

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